क्या लिखूँ Chapter 2 Class 9 Ganga Hindi Summary

Kya likhun Chapter 2 Class 9 Ganga Hindi Summary में chapter के मुख्य विचारों और important events को easy language में संक्षेप में दिया गया है, ताकि विद्यार्थी बिना पूरे पाठ को बार-बार पढ़े उसके main concepts को easily समझ सकें। इसमें लेखक ने निबंध लिखने की प्रक्रिया, उसके लिए आवश्यक तैयारी और लेखन के दौरान आने वाली कठिनाइयों को हास्य और आत्मपरक शैली में प्रस्तुत किया है।

लेखक परिचय

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म 1894 ई. में खैरागढ़, राजनांदगाँव, छत्तीसगढ़ में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक, कवि, निबंधकार तथा हास्य व्यंग्यकार थे। उनके लेखन में अध्यात्म, समाज सुधार और लोकजीवन को प्रमुखता मिली है। निबंध लेखन के क्षेत्र में उनका विशेष स्थान है। उन्होंने सरस्वती और छाया जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

प्रमुख रचना – पंच-पात्र, पद्म-वन, प्रबंध पारिजात, कुछ बिखरे पन्ने, अश्दल, शतदल, झलमला और त्रिवेणी आदि।

क्या लिखूँ Class 9 Chapter 2 Summary

लेखन की मानसिक स्थिति

लेखक निबंध की शुरुआत अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध निबंधकार ए. जी. गार्डिनर के विचार से करते हैं। गार्डिनर के अनुसार लिखने की एक विशेष मानसिक अवस्था होती है। उस समय मन में उमंग, हृदय में स्फूर्ति और मस्तिष्क में ऐसा आवेग पैदा होता है कि व्यक्ति लिखने के लिए प्रेरित हो जाता है। उस समय विषय अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं रहता, बल्कि लेखक के मनोभाव अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं।

लेकिन लेखक कहते हैं कि उन्होंने ऐसी मानसिक स्थिति का अनुभव कभी नहीं किया। उन्हें निबंध लिखने के लिए सोचना, चिंता करना और परिश्रम करना पड़ता है। इस समय उनकी कठिनाई इसलिए और बढ़ गई है क्योंकि उन्हें नमिता और अमिता के लिए दो अलग अलग विषयों पर आदर्श निबंध लिखने हैं।

निबंध के विषय और लेखक की परेशानी

नमिता ने लेखक से ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ और अमिता ने ‘समाज-सुधार’ विषय पर निबंध लिखने को कहा है। लेखक सोचते हैं कि ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ जैसे छोटे-से विषय पर पाँच पृष्ठ कैसे लिखे जाएँ। इसी तरह समाज-सुधार जैसे बहुत व्यापक विषय को भी पाँच पृष्ठों में समेटना कठिन है।

निबंध के प्रमुख अंग

निबंधशास्त्र के एक विद्वान के अनुसार निबंध छोटा होना चाहिए। छोटा निबंध अधिक अच्छा होता है, क्योंकि बड़े निबंध में रचना की सुंदरता बनाए रखना कठिन हो सकता है। यह बात लेखक के लिए सुविधाजनक है क्योंकि उन्हें छोटे निबंध ही लिखने हैं।

उसी विद्वान के अनुसार निबंध के दो प्रमुख अंग हैं-

  • सामग्री – निबंध में लिखे जाने वाले विचार, तथ्य और विषय से संबंधित बातें।
  • शैली – उन विचारों को प्रस्तुत करने का ढंग और भाषा का स्वरूप।

रूपरेखा बनाने की समस्या

विद्वानों का कहना है कि निबंध लिखने से पहले उसकी रूपरेखा तैयार कर लेनी चाहिए। लेकिन लेखक के लिए यह भी कठिन है। वे कहते हैं कि निबंध लिख लेने के बाद उसका सार कुछ वाक्यों में लिखा जा सकता है, लेकिन निबंध लिखने से पहले ही उसके विचारों का सार कैसे तैयार किया जाए?

लेखक ए. जी. गार्डिनर का उदाहरण देते हैं। गार्डिनर को भी अपने लेखों के शीर्षक देने में कठिनाई होती थी। लेखक मजाक करते हुए शेक्सपीयर का उदाहरण भी देते हैं कि शायद उन्हें नाटक लिखने से अधिक कठिनाई उनके नाम रखने में हुई होगी।

सरल शैली का विचार

लेखक मोंटेन की शैली से प्रभावित होते हैं। इसमें लेखक अपने देखे, सुने और अनुभव किए हुए विषयों को सरल और स्वाभाविक ढंग से लिखता है। लेखक को यह तरीका अच्छा लगता है।

अमीर खुसरो से प्रेरणा

लेखक को अचानक अमीर खुसरो की एक कहानी याद आती है। एक बार खुसरो एक कुएँ पर पहुँचे, जहाँ चार महिलाएँ पानी भर रही थीं। उन्होंने खुसरो से क्रमशः खीर, चरखा, कुत्ता और ढोल पर कविता सुनाने को कहा।

खुसरो ने अपनी प्रतिभा से चारों विषयों को एक ही पद में जोड़ दिया-

“खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।’’

इससे प्रेरित होकर लेखक दोनों विषयों को एक ही निबंध में जोड़ने का निर्णय लेते हैं।

दूर के ढोल सुहावने

ढोल की आवाज पास से कर्कश लगती है, लेकिन दूर से वही आवाज मधुर लगती है। लेखक बताते हैं कि दूरी के कारण हमें वास्तविकता की कठोरता कम दिखाई देती है। इसी कारण दूर की चीजें अधिक सुंदर लगती हैं।

युवा और वृद्ध

युवा लोग भविष्य को सुंदर मानते हैं, जबकि वृद्ध लोग अतीत को सुखद मानते हैं। दोनों वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं। युवा परिवर्तन चाहते हैं और वृद्ध अतीत के गौरव को बनाए रखना चाहते हैं।

समाज सुधार

लेखक के अनुसार समाज में सुधार की आवश्यकता हमेशा रहती है। बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी जैसे अनेक सुधारकों ने समाज को नई दिशा दी।

निरंतर परिवर्तन

समाज में नए दोष पैदा होते रहते हैं और उनके सुधार भी होते रहते हैं। जो कभी सुधार था, वह समय के साथ दोष बन सकता है। इसी निरंतर सुधार और परिवर्तन के कारण जीवन प्रगतिशील बना रहता है।

कठिन शब्दार्थ of क्या लिखूँ

कठिन शब्दअर्थ
स्फूर्तिउत्साह, फुर्ती
आवेगतीव्र प्रेरणा या भावों का जोर
यथार्थतावास्तविकता
मननगहराई से विचार करना
चिंतनगंभीरता से सोचना
अनुसंधानखोज या जाँच-पड़ताल
विश्वकोशविभिन्न विषयों की जानकारी देने वाला ग्रंथ
रूपरेखाकिसी लेख या विषय की संक्षिप्त योजना
शीर्षकनाम
प्रवाहलगातार और सहज गति
अस्पष्टतास्पष्ट न होने की स्थिति
दुर्बोधताजिसे समझना कठिन हो
गांभीर्यगंभीरता, गहराई
गत्थियाँउलझनें या कठिनाइयाँ
पद्धतितरीका, प्रणाली
स्वच्छंदस्वतंत्र, बिना बंधन के
उदात्तमहान, ऊँचा
अभिव्यक्तिभावों या विचारों को प्रकट करना
समावेशशामिल करना
कर्कशतीखी और अप्रिय
संध्याशाम का समय
कोलाहलबहुत अधिक शोर
कलरवमधुर ध्वनि
विषादउदासी
प्रमोदआनंद
आक्रोशबहुत अधिक क्रोध
प्रगतिशीलआगे बढ़ने वाला
सुधारकसमाज में सुधार करने वाला
अनादिजिसका आरंभ ज्ञात न हो
रहस्यछिपी हुई बात
सहमतिकिसी बात से सहमत होना

Chapter में आए मुहावरे और उनके प्रयोग

मुहावराअर्थवाक्य प्रयोग
कान के पर्दे फटनाबहुत तेज आवाज से अत्यधिक कष्ट होनाढोल की तेज आवाज से लोगों के कान के पर्दे फटने लगे।
खरे सिद्ध होनासही या योग्य साबित होनावह अपनी परीक्षा में शिक्षक की कसौटी पर खरा सिद्ध हुआ।
मन में उमंग उठनामन में उत्साह या प्रसन्नता उत्पन्न होनापुरस्कार मिलने की खबर से उसके मन में उमंग उठी।
हृदय में स्फूर्ति आनामन में उत्साह और ऊर्जा का संचार होनासफलता की खबर सुनकर उसके हृदय में स्फूर्ति आ गई।
अपनी विद्वता का प्रदर्शन करनाअपने ज्ञान या योग्यता को दिखानावह हर अवसर पर अपनी विद्वता का प्रदर्शन करने लगता है।
नामकरण करनाकिसी वस्तु, रचना आदि का नाम रखनालेखक ने अपनी नई पुस्तक का नामकरण किया।
दूर के ढोल सुहावने होनादूर की वस्तु या स्थिति वास्तविकता से अधिक अच्छी लगनादूसरे शहर की नौकरी दूर के ढोल सुहावने जैसी लग रही थी।
अतीत का स्वप्न देखनाबीते समय को याद करके उसके सुख की कल्पना करनावृद्ध व्यक्ति अक्सर अपने बचपन के अतीत का स्वप्न देखते हैं।

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