दो बैलों की कथा कहानी के मुख्य पात्र दो बैल हीरा और मोती हैं, जो आपस में बहुत गहरी मित्रता रखते हैं। दोनों एक-दूसरे की भावनाओं को बिना बोले समझते हैं और हर परिस्थिति में साथ रहते हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि स्वतंत्रता, प्रेम और आत्मसम्मान केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं बल्कि पशुओं के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। यह Class 9 Chapter 1 का Summary निश्चित रूप से उन students के लिए काफी useful रहने वाला है जो chapter को एक बार में revise करना चाहते हैं साथ ही उन शब्दार्थ का अर्थ समझना चाहते हैं जो उनके लिए कठिन है।
लेखक परिचय
मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के महान कथाकार और उपन्यासकार थे। उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उन्हें ‘कथा सम्राट’ के नाम से जाना जाता है। प्रेमचंद की कहानियों की भाषा सरल, सहज और प्रभावशाली है। उनकी रचनाओं में समाज और जीवन की वास्तविक परिस्थितियों का सजीव चित्रण मिलता है।
दो बैलों की कथा Class 9 Chapter 1 Summary
हीरा और मोती का झूरी से लगाव
हीरा और मोती किसान झूरी के बैल थे। झूरी उन्हें बहुत प्यार करता था और दोनों भी अपने मालिक से बहुत स्नेह करते थे। वे मेहनती और समझदार थे। हल या गाड़ी में जोते जाने पर दोनों एक-दूसरे का साथ देते और दिनभर की थकान के बाद भी साथ रहते थे।
एक दिन झूरी ने अपने साले गया के घर दोनों बैलों को भेज दिया। बैलों को लगा कि शायद झूरी ने उन्हें बेच दिया है। वे गया के साथ जाने को तैयार नहीं हुए। गया को उन्हें घर तक ले जाने में दाँतों पसीना आ गया, क्योंकि दोनों बार-बार पीछे या इधर-उधर भागते थे।
गया के घर की कठिनाइयाँ
गया के घर पहुँचकर दोनों बैलों ने खाना तक नहीं खाया। उन्हें अपना पुराना घर और झूरी बहुत याद आ रहे थे। रात में उन्होंने अपनी मजबूत रस्सियाँ तोड़ दीं और झूरी के घर लौट आए। झूरी उन्हें देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और प्रेम से गले लगा लिया। गाँव के बच्चों ने भी उनका स्वागत किया।
लेकिन झूरी की पत्नी को यह बात अच्छी नहीं लगी। उसने बैलों को नमकहराम और कामचोर कहा। उसने उन्हें अच्छा चारा देने से मना कर दिया। अगले दिन गया फिर उन्हें ले गया। इस बार दोनों को बहुत मारा गया और सूखा भूसा दिया गया।
छोटी लड़की का प्रेम
गया के घर में एक छोटी लड़की रहती थी। उसकी माँ मर चुकी थी और उसकी सौतेली माँ उसे मारती थी। इसलिए उस लड़की को हीरा और मोती से अपनापन महसूस हुआ। वह रोज रात को चुपके से उन्हें दो रोटियाँ खिलाती थी।
रोटियों से उनकी भूख पूरी नहीं होती थी, लेकिन लड़की के प्रेम से उन्हें बहुत संतोष मिलता था। दोनों उसके प्रति इतने संवेदनशील थे कि जब लड़की ने उनकी रस्सियाँ खोलकर उन्हें भागने में मदद की, तब भी वे तुरंत नहीं भागे। उन्हें डर था कि उनके भागने का दोष उस अनाथ लड़की पर लगेगा और उसे मार पड़ेगी।
स्वतंत्रता की ओर
आखिर लड़की ने समझदारी से शोर मचाकर ऐसा दिखाया कि बैल स्वयं भाग गए हैं। इससे हीरा और मोती भागने में सफल हुए। रास्ता भटक जाने के बाद वे खेतों में चरने लगे और पहली बार आजादी का अनुभव किया।
इसी दौरान उनका सामना एक शक्तिशाली साँड़ से हुआ। दोनों जानते थे कि अकेले उससे लड़ना कठिन है, इसलिए उन्होंने मिलकर योजना बनाई। हीरा सामने से और मोती पीछे से उस पर हमला करता रहा। उनकी एकता और समझदारी के कारण वे साँड़ को हरा पाए।
काँजीहौस में बंदी
इसके बाद दोनों मटर के खेत में घुस गए। खेत के रखवालों ने उन्हें पकड़ लिया और काँजीहौस में बंद कर दिया। वहाँ उन्हें खाने के लिए कुछ नहीं मिलता था। वहाँ बंद दूसरे पशु भी भूख और कमजोरी से परेशान थे।
हीरा ने दूसरे पशुओं को बचाने के लिए काँजीहौस की दीवार तोड़ने का प्रयास किया। चौकीदार ने उसे पीटा और बाँध दिया। लेकिन मोती ने भी उसका साथ दिया। दोनों ने मिलकर दीवार तोड़ दी और कई पशुओं को बाहर निकलने का रास्ता मिल गया। मोती स्वयं वहीं रुक गया क्योंकि हीरा बँधा हुआ था।
मोती ने अपने मित्र को अकेला नहीं छोड़ा। उसने दूसरे गधों को भी बाहर निकाला और फिर हीरा के पास लौट आया। दोनों को बहुत मारा गया और फिर से बाँध दिया गया।
झूरी के घर वापसी
कई दिनों तक भूखे और कमजोर रहने के बाद दोनों बैलों को नीलाम कर दिया गया। एक दाढ़ी वाला आदमी उन्हें खरीदकर ले जाने लगा। रास्ते में हीरा और मोती को धीरे-धीरे परिचित रास्ता दिखाई देने लगा। उन्हें समझ में आ गया कि वे अपने गाँव और झूरी के घर की ओर जा रहे हैं।
घर का रास्ता पहचानते ही उनकी थकान और कमजोरी जैसे गायब हो गई। दोनों तेजी से अपने पुराने थान की ओर दौड़े और झूरी के घर पहुँच गए। झूरी उन्हें देखकर खुशी से गदगद हो गया और दोनों को गले लगा लिया। दाढ़ी वाला आदमी उन्हें वापस ले जाना चाहता था लेकिन मोती ने उसे गाँव से बाहर तक खदेड़ दिया। अंत में हीरा और मोती अपने प्यारे मालिक के पास सुरक्षित लौट आए।
कठिन शब्दार्थ of Do Bailon ki Katha
| कठिन शब्द | अर्थ |
|---|---|
| निरापद | आपत्ति से रहित, सुरक्षित |
| सहिष्णुता | सहन करने की क्षमता |
| विषाद | उदासी |
| पराकाष्ठा | चरम सीमा |
| कदाचित् | शायद, कभी |
| चौकस | सावधान |
| डील | शरीर का आकार |
| विग्रह | झगड़ा, विरोध |
| विनोद | मनोरंजन, हँसी-मजाक |
| आत्मीयता | अपनापन |
| नाँद | पशुओं को चारा-पानी देने का बड़ा पात्र |
| पगहा | पशु बाँधने की रस्सी |
| कनखी | आँख की कोर से देखना |
| चरनी | पशुओं को चारा देने की जगह |
| गराँव | पशु के गले में पहनाई जाने वाली फंदेदार रस्सी |
| प्रतिवाद | विरोध में कही गई बात |
| ताकीद | बार-बार चेतावनी देना |
| टिटकारना | पशु को चलाने के लिए आवाज करना |
| तेवर | क्रोध या भाव प्रकट करने वाली दृष्टि |
| बरकत | वृद्धि, लाभ |
| बेतहाशा | बहुत तेजी से, बदहवास होकर |
| व्याकुल | बहुत परेशान या घबराया हुआ |
| रगेदना | भगाना, खदेड़ना |
| तजरबा | अनुभव |
| ग्रास | कौर, निवाला |
| मेड़ | खेत की सीमा पर बनी मिट्टी की पट्टी |
| काँजीहौस | आवारा या पकड़े गए पशुओं को बंद रखने का बाड़ा |
| तृप्ति | भोजन आदि से मिलने वाला संतोष |
| दहकना | तेज जलना |
| उजड्डपन | अशिष्टता, उद्दंडता |
| बता | सामर्थ्य, शक्ति |
| आजमाना | परीक्षा लेना या प्रयोग करना |
| चेत | होश, सावधानी |
| डुग्गी | चमड़े से मढ़ा छोटा बाजा |
| उन्मत्त | बहुत उत्तेजित या मतवाला |
| नीलाम | सबसे अधिक बोली लगाने वाले को वस्तु बेचना |
| अख्तियार | अधिकार, वश |
दो बैलों की कथा कहानी में आए प्रमुख मुहावरे एवं प्रयोग
| मुहावरा | वाक्य | अर्थ |
|---|---|---|
| मन फीका करना | लोग आ-आकर उनकी सूरत देखते और मन फीका करके चले जाते। | निराश या उदास होना |
| दाँतों पसीना आना | झूरी के साले गया को घर तक गोई ले जाने में दाँतों पसीना आ गया। | बहुत कठिनाई होना |
| दिल काँप उठना | उसका चेहरा देखकर अंतर्ज्ञान से दोनों मित्रों के दिल काँप उठे। | बहुत डर जाना |
| जल उठना | झूरी की स्त्री ने बैलों को द्वार पर देखा, तो जल उठी। | ईर्ष्या या क्रोध से भर जाना |
| दिल में ऐंठकर रह जाना | मोती दिल में ऐंठकर रह गया। | मन में बहुत दुख या क्रोध दबाकर रह जाना |
| दूर ही से खबर लेना | आएगा तो दूर ही से खबर लूँगा। देखूँ कैसे ले जाता है। | दूर रहकर स्थिति का पता लगाना या सामना करना |
| जी तोड़कर काम करना | जी तोड़कर काम करते हैं, किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करते, चार बातें सुनकर गुम खा जाते हैं। | पूरी मेहनत से काम करना |
| गुम खा जाना | जी तोड़कर काम करते हैं, किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करते, चार बातें सुनकर गुम खा जाते हैं। | चुपचाप अपमान या बात सह लेना |
| ईंट का जवाब पत्थर से देना | “अगर वे भी ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते, तो शायद सभ्य कहलाने लगते।” | किसी के आक्रमण या व्यवहार का उसी प्रकार कड़ा जवाब देना |
| नौ-दो ग्यारह होना | तो फिर वहीं मरो। बंदा तो नौ-दो ग्यारह होता है। | भाग जाना |