कबीर के दोहे chapter 5 Class 8 students के लिए काफी useful रहने वाले हैं क्योंकि ये बच्चों को chapter understand में easy रहेंगें| इन दोहों के माध्यम से हमें सीख मिलती है कि सत्य का पालन करना चाहिए, जीवन में संतुलन रखना चाहिए, गुरु का सम्मान करना चाहिए, मधुर वाणी बोलनी चाहिए, आलोचना से सीखना चाहिए, अच्छे गुणों को अपनाना चाहिए और अच्छी संगति करनी चाहिए।
कवि परिचय
संत कबीर महान संत और कवि थे। उनकी रचनाएँ आज भी लोगों को जीवन की सच्चाइयों को समझने और अच्छा मनुष्य बनने की प्रेरणा देती हैं। उनकी कविताएँ आज भी भजनों की तरह सुनी जाती हैं। माना जाता है कि कबीर का जन्म चौदहवीं शताब्दी में काशी में हुआ था।
उनकी रचनाएँ मुख्यतः कबीर ग्रंथावली में संकलित हैं।
कबीर के दोहे व्याख्या Chapter 5 Explanation
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।
कठिन शब्दार्थ
साँच – सत्य
तप – तपस्या
पाप – बुरा कर्म
हिरदे – हृदय, मन
गुरु आप – गुरु स्वयं
कबीर कहते हैं कि संसार में सत्य का पालन करने से बड़ी कोई तपस्या नहीं है और झूठ बोलने से बड़ा कोई पाप नहीं है। जिस व्यक्ति के हृदय में सत्य का निवास होता है, उसके भीतर ज्ञान और सही मार्गदर्शन अपने आप आ जाता है। सत्य मनुष्य के जीवन को पवित्र और श्रेष्ठ बनाता है।
कला-पक्ष
- भाषा – सरल, सहज और लोकभाषा के निकट।
- शैली – उपदेशात्मक एवं प्रभावशाली।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।
कठिन शब्दार्थ
बड़ा हुआ – ऊँचा या महान बना
पंथी – यात्री
छाया – आश्रय
फल लागे अति दूर – फल बहुत ऊँचाई पर लगते हैं
कबीर कहते हैं कि केवल बड़ा या ऊँचा होने से क्या लाभ? खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा होता है, लेकिन यात्रियों को उसकी छाया नहीं मिलती और उसके फल भी बहुत ऊँचाई पर होते हैं। मनुष्य का बड़ा, धनी या ऊँचे पद पर होना तभी सार्थक है, जब वह दूसरों के काम आए। यदि किसी व्यक्ति की ऊँचाई से समाज या दूसरे लोगों को कोई लाभ नहीं मिलता, तो ऐसी महानता व्यर्थ है। सच्ची महानता दूसरों की सहायता करने में है।
कला पक्ष
- भाषा – सरल, सहज और बोलचाल की।
- शैली – उदाहरण देकर समझाने वाली।
- अलंकार – उपमा अलंकार क्योंकि व्यक्ति की तुलना खजूर के पेड़ से की गई है – जैसे पेड़ खजूर।
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
कठिन शब्दार्थ
गुरु – शिक्षक
गोविंद – ईश्वर
दोऊ – दोनों
काके – किसके
पाँय – पैर, चरण
बलिहारी – अत्यंत आभारी होना
यदि गुरु और भगवान दोनों एक साथ सामने खड़े हों, तो कबीर कहते हैं कि पहले गुरु के चरणों में प्रणाम करना चाहिए। गुरु ही हमें भगवान का ज्ञान और मार्ग बताते हैं। गुरु मनुष्य को ज्ञान देता है और सही मार्ग दिखाता है। गुरु के मार्गदर्शन के बिना ईश्वर या सत्य को समझना कठिन हो सकता है। इसलिए कबीर ने गुरु के महत्त्व को बहुत ऊँचा स्थान दिया है।
कला पक्ष
- भाषा – सरल और प्रभावशाली।
- शैली – संवादात्मक एवं उपदेशात्मक।
- अलंकार – प्रश्नात्मक शैली का प्रयोग – काके लागौं पाँय?।
अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।
कठिन शब्दार्थ
अति – बहुत अधिक
बोलना – अधिक बातें करना
चूप – चुप रहना
बरसना – वर्षा होना
धूप – सूर्य की तेज किरणें
कबीर कहते हैं कि बहुत अधिक बोलना भी अच्छा नहीं है और बहुत अधिक चुप रहना भी अच्छा नहीं है। इसी प्रकार बहुत अधिक वर्षा और बहुत तेज धूप भी लाभदायक नहीं होती। जीवन में हर चीज की एक उचित सीमा होनी चाहिए। आवश्यकता से अधिक बोलना परेशानी पैदा कर सकता है और हमेशा चुप रहना भी उचित नहीं है। इसी प्रकार अधिक वर्षा से बाढ़ आ सकती है और अधिक धूप से नुकसान हो सकता है। इसलिए जीवन में संतुलन आवश्यक है।
कला पक्ष
- भाषा – सरल, सहज और प्रभावशाली।
- शैली – उपदेशात्मक।
- छंद – दोहा।
- अलंकार – पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रभाव दिखाई देता है क्योंकि ‘अति’ शब्द की बार-बार पुनरावृत्ति हुई है।
ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।
कठिन शब्दार्थ
बानी – वाणी, बोली
आपा – अहंकार
औरन – दूसरों
सीतल – शांत, सुखद
आपहुँ – स्वयं भी
कबीर कहते हैं कि हमें ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जिससे हमारा अहंकार समाप्त हो जाए और हमारी बात सुनने वाले को भी शांति मिले। ऐसी मधुर वाणी बोलने से हमारा अपना मन भी शांत रहता है। हमारे शब्दों का प्रभाव दूसरों के साथ-साथ हम पर भी पड़ता है। कठोर शब्द किसी के मन को दुखी कर सकते हैं जबकि मधुर और विनम्र वाणी संबंधों को मजबूत करती है। इसलिए हमें सोच-समझकर और प्रेमपूर्वक बोलना चाहिए।
कला पक्ष
- भाषा – सरल, मधुर और सहज।
- शैली – उपदेशात्मक।
- शब्द पुनरावृत्ति – सीतल शब्द की पुनरावृत्ति से शांति के भाव को बल मिलता है।
निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय।।
कठिन शब्दार्थ
निंदक – आलोचना करने वाला व्यक्ति
नियरे – पास
कुटी – छोटी झोपड़ी
निर्मल – साफ
सुभाय – स्वभाव
कबीर कहते हैं कि आलोचना करने वाले व्यक्ति को अपने पास रखना चाहिए। उसे अपने घर के आँगन में भी रहने की जगह दे देनी चाहिए क्योंकि वह बिना पानी और साबुन के हमारे स्वभाव को साफ कर देता है। जो व्यक्ति हमारी गलतियाँ बताता है, वह हमारे सुधार में सहायता करता है। यदि कोई हमारी कमियाँ बताता है तो हमें बुरा मानने के बजाय उनसे सीखना चाहिए। आलोचना हमें अपनी गलतियों को पहचानने और उन्हें सुधारने का अवसर देती है।
कला पक्ष
- भाषा – सरल एवं लोकप्रचलित।
- शैली – उदाहरणात्मक और उपदेशात्मक।
- अलंकार – रूपकात्मक प्रयोग, निंदक को ऐसा माना गया है जैसे वह बिना साबुन-पानी के स्वभाव को साफ करने वाला साधन हो।
साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय।।
कठिन शब्दार्थ
साधु – संत
सूप – अनाज साफ करने का उपकरण
सुभाय – स्वभाव
सार-सार – उपयोगी और अच्छी बातें
थोथा – बेकार वस्तु
गहि रहै – पकड़कर रखता है
उड़ाय – अलग कर देता है
कबीर कहते हैं कि सच्चे साधु का स्वभाव सूप जैसा होना चाहिए। जिस प्रकार सूप अनाज के अच्छे दानों को अपने पास रखता है और भूसी जैसी बेकार चीजों को अलग कर देता है उसी प्रकार मनुष्य को अच्छी बातों को अपनाकर बुरी बातों को छोड़ देना चाहिए। हमें किसी भी बात को बिना सोचे-समझे स्वीकार नहीं करना चाहिए। अच्छे और बुरे में अंतर पहचानने के लिए विवेक और समझ का प्रयोग करना चाहिए।
कला पक्ष
- भाषा – सरल और चित्रात्मक।
- शैली – उदाहरण द्वारा समझाने वाली।
- अलंकार – उपमा अलंकार, क्योंकि साधु के स्वभाव की तुलना सूप से की गई है जैसा सूप।
कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।।
कठिन शब्दार्थ
मन – हृदय/विचार
पंछी – पक्षी
भया – हो गया
भावै – इच्छा हो
तहवाँ – वहाँ
संगति – साथ
फल पाय – परिणाम प्राप्त करता है
कबीर कहते हैं कि मन पक्षी के समान है। वह जहाँ जाना चाहता है, वहाँ चला जाता है। मनुष्य जिस प्रकार के लोगों की संगति करता है उसे उसी प्रकार का परिणाम मिलता है। मनुष्य की संगति उसके विचारों, आदतों और व्यवहार को प्रभावित करती है। अच्छी संगति से अच्छे विचार और अच्छे संस्कार विकसित होते हैं, जबकि बुरी संगति से बुरी आदतें पैदा हो सकती हैं। इसलिए हमें अपने मित्रों और संगति का चुनाव सोच-समझकर करना चाहिए।
कला पक्ष
- भाषा – सरल, सहज और प्रभावशाली।
- शैली – उदाहरणात्मक एवं उपदेशात्मक।
- छंद – दोहा।
- अलंकार – रूपक अलंकार, क्योंकि मन को सीधे पंछी कहा गया है “मन पंछी भया”।