Class 6 Hindi Ch 2 गोल Summary Malhar Textbook are given on this page which will be quite helpful for students in learning important details and concepts.
गोल भारत के महान हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद के संस्मरण पर आधारित है। इस chapter में ध्यानचंद जी अपने जीवन की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं को याद करते हुए बताते हैं कि सफलता केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि लगन, अभ्यास, खेल भावना और टीमवर्क से प्राप्त होती है।
गोल Chapter का Detailed Summary
मेजर ध्यानचंद का जन्म 1905 में प्रयाग में एक साधारण परिवार में हुआ था। बाद में उनका परिवार झाँसी में बस गया। सिर्फ 16 वर्ष की आयु में वे फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट में एक साधारण सैनिक के रूप में भर्ती हो गए। उस समय उनकी रेजिमेंट हॉकी के लिए प्रसिद्ध थी, लेकिन स्वयं ध्यानचंद जी की हॉकी में कोई विशेष रुचि नहीं थी।
उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका उनके सूबेदार मेजर तिवारी ने निभाई। वे लगातार ध्यानचंद जी को हॉकी खेलने के लिए प्रेरित करते थे। उनकी प्रेरणा और अपने परिश्रम के कारण ध्यानचंद जी धीरे-धीरे एक उत्कृष्ट खिलाड़ी बन गए।
ध्यानचंद जी एक रोमांचक घटना बताते हुए कहते हैं कि सन् 1933 में वे पंजाब रेजिमेंट की ओर से हॉकी खेलते थे। एक मैच में पंजाब रेजिमेंट और सैंपर्स एंड माइनर्स टीम आमने-सामने थीं। मैच के दौरान विरोधी टीम के खिलाड़ी उनसे गेंद छीनने की बार-बार कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनकी हर कोशिश असफल हो रही थी। ध्यानचंद जी की शानदार गेंद पर नियंत्रण के कारण विपक्षी खिलाड़ी परेशान हो गए थे।
इसी बीच एक खिलाड़ी गुस्से में आ गया और उसने हॉकी स्टिक से ध्यानचंद जी के सिर पर वार कर दिया। चोट लगने के कारण उन्हें मैदान से बाहर ले जाना पड़ा। लेकिन यहाँ से ध्यानचंद जी का असली चरित्र सामने आता है। कुछ देर बाद वे सिर पर पट्टी बाँधकर फिर मैदान में लौट आए। उन्होंने उस खिलाड़ी की पीठ थपथपाई और मुस्कुराते हुए कहा, “तुम चिंता मत करो, इसका बदला मैं जरूर लूँगा।”
लेकिन ध्यानचंद जी का बदला लेने का तरीका बिल्कुल अलग था। उन्होंने खेल में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और एक के बाद एक छह गोल कर दिए। मैच समाप्त होने के बाद उन्होंने उसी खिलाड़ी से कहा कि खेल में इतना गुस्सा करना ठीक नहीं है। उन्होंने बताया कि उनका बदला हिंसा नहीं, बल्कि उत्कृष्ट खेल प्रदर्शन था। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्चा खिलाड़ी कभी बदले की भावना से नहीं खेलता। खेल में अनुशासन और संयम सबसे महत्वपूर्ण होते हैं।
मेजर ध्यानचंद के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव सन् 1936 का बर्लिन ओलंपिक था। इस प्रतियोगिता में उन्हें भारतीय हॉकी टीम का कप्तान बनाया गया। उस समय वे सेना में लांस नायक के पद पर कार्यरत थे। बर्लिन ओलंपिक में उनके खेल को देखकर दुनिया भर के लोग हैरान रह गए। उनकी हॉकी स्टिक पर गेंद इस प्रकार नियंत्रित रहती थी कि लोगों को लगता था जैसे कोई जादू हो रहा हो। इसी कारण लोगों ने उन्हें “हॉकी का जादूगर” कहना शुरू कर दिया।
मेजर ध्यानचंद के नेतृत्व में भारतीय हॉकी टीम ने 1936 के बर्लिन ओलंपिक में शानदार प्रदर्शन किया और स्वर्ण पदक जीता वे बताते हैं कि उनका उद्देश्य केवल खुद गोल करना नहीं था, बल्कि वे गेंद को गोल के पास ले जाकर साथी खिलाड़ी को पास देते ताकि उसे गोल करने का श्रेय मिले। इस विजय में ध्यानचंद जी की कप्तानी, नेतृत्व क्षमता और खेल कौशल की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
गोल Chapter के महत्वपूर्ण शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| संस्मरण | किसी व्यक्ति द्वारा अपने जीवन की यादों का वर्णन |
| रेजिमेंट | सेना की एक टुकड़ी या दल |
| सिपाही | सेना का साधारण सैनिक |
| सूबेदार | सेना का एक उच्च पद |
| लांस नायक | भारतीय सेना का एक पद (रैंक) |
| छावनी | सैनिकों के रहने और प्रशिक्षण का स्थान |
| मुकाबला | प्रतियोगिता या खेल |
| प्रहार | वार करना, चोट पहुँचाना |
| घायल | जिसे चोट लगी हो |
| पट्टी | घाव पर बाँधा जाने वाला कपड़ा |
| बदला | किसी के व्यवहार का उत्तर देना |
| खेल भावना | खेल को ईमानदारी और अच्छे व्यवहार के साथ खेलना |
| लगन | किसी काम के प्रति पूरी मेहनत और रुचि |
| साधना | लगातार अभ्यास और मेहनत |
| नौसिखिया | नया सीखने वाला व्यक्ति |
| निखार | सुधार या बेहतर होना |
| तरक्की | उन्नति, प्रगति |
| कप्तान | टीम का नेता |
| प्रभावित | किसी की विशेषता से प्रभावित होना |
| जादूगर | असाधारण कौशल वाला व्यक्ति |
| श्रेय | सफलता का सम्मान या प्रशंसा |
| स्वर्ण पदक | प्रथम स्थान पाने पर मिलने वाला गोल्ड मेडल |
| देशभक्ति | अपने देश के प्रति प्रेम |
| खेल रत्न पुरस्कार | भारत का सर्वोच्च खेल सम्मान |
| अनुशासन | नियमों का पालन करना |
| संयम | अपने गुस्से और भावनाओं पर नियंत्रण रखना |