Pehli Boond Class 6 Explanation Summary पहली बूँद पाठ सार

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पहली बूँद गोपालकृष्ण कौल द्वारा रचित है जिसमें कवि ने वर्षा ऋतु की पहली बूँद के धरती पर गिरने से प्रकृति में आने वाले परिवर्तन का अत्यंत मनोहारी चित्रण किया है। लंबे समय तक गर्मी और सूखे से पीड़ित धरती जब वर्षा की पहली बूँद का स्पर्श पाती है, तो उसमें नया जीवन जाग उठता है। अंकुर फूट पड़ते हैं, हरी दूब मुस्कुराने लगती है और पूरी प्रकृति आनंद से भर जाती है। कवि ने धरती, बादलों और आकाश का मानवीकरण करते हुए उन्हें जीवित पात्रों के रूप में प्रस्तुत किया है। सूखी धरती को प्यासे मनुष्य के समान, वर्षा की बूँद को अमृत के समान तथा बादलों को करुणा से भरे हुए बताया गया है। बादलों की गर्जना नगाड़ों की ध्वनि जैसी प्रतीत होती है जो धरती की तरुणाई को जगा देती है।

कवि परिचय

गोपालकृष्ण कौल हिंदी के प्रसिद्ध बाल साहित्यकार थे। उन्होंने बच्चों के लिए अनेक प्रेरणादायक, मनोरंजक और ज्ञानवर्धक कविताएँ लिखीं। उनकी रचनाओं में देशप्रेम, प्रकृति, नैतिक मूल्यों तथा जीव-जंतुओं का सुंदर चित्रण मिलता है। उनकी भाषा सरल, सरस और बालकों की समझ के अनुकूल है जिससे उनकी कविताएँ बच्चों में अत्यंत लोकप्रिय हैं।

पहली बूँद कविता का भावार्थ (Line By Line Explanation)

वह पावस का प्रथम दिवस जब,
पहली बूँद धरा पर आई।
अंकुर फूट पड़ा धरती से,
नव-जीवन की ले अँगड़ाई।

वर्षा ऋतु का पहला दिन था। लंबे समय से सूखी और प्यास से व्याकुल धरती पर वर्षा की पहली बूँद गिरी। यह केवल पानी की बूँद नहीं, बल्कि आशा, खुशी और नए जीवन का संदेश लेकर आई है। वर्षा की बूँद पड़ते ही धरती से नया अंकुर निकल आया। ऐसा लगता है मानो नया जीवन नींद से जागकर अंगड़ाई ले रहा हो।

कला पक्ष

  • भाषा सरल, सरस, सहज और भावपूर्ण है।
  • चित्रात्मक एवं वर्णनात्मक शैली है।
  • नव-जीवन की ले अँगड़ाई में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग हुआ है।

धरती के सूखे अधरों पर,
गिरी बूँद अमृत-सी आकर।
वसुंधरा की रोमावलि-सी,
हरी दूब पुलकी-मुस्काई।
पहली बूँद धरा पर आई।

यहाँ सूखी धरती की तुलना सूखे होंठों से की गई है। वर्षा की बूँद अमृत के समान धरती पर गिरी और उसकी प्यास बुझाने लगी। वर्षा के बाद उगी हरी दूब धरती के शरीर के रोमों जैसी प्रतीत होती है। वह खुशी से मुस्कुराती हुई दिखाई देती है। जब पहली बूँद धरती पर गिरी।

कला-पक्ष

  • भाषा सरल एवं सरस है।
  • चित्रात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।
  • “अमृत-सी” तथा “रोमावलि-सी” में उपमा अलंकार है।
  • “धरती के सूखे अधरों पर” और “हरी दूब पुलकी-मुस्काई” में मानवीकरण अलंकार है।

आसमान में उड़ता सागर,
लगा बिजलियों के स्वर्णिम पर।
बजा नगाड़े जगा रहे हैं,
बादल धरती की तरुणाई।
पहली बूँद धरा पर आई।

कवि बादलों को उड़ता हुआ सागर कहते हैं क्योंकि बादल समुद्र के जल से बनते हैं। बिजली की चमक उनके सुनहरे पंखों जैसी दिखाई देती है। बादलों की गर्जना नगाड़ों की ध्वनि जैसी प्रतीत होती है। उनकी आवाज धरती की युवावस्था और ताजगी को जगा रही है।

कला-पक्ष

  • “आसमान में उड़ता सागर” तथा “बजा नगाड़े” में रूपक अलंकार है।
  • “जगा रहे हैं” में मानवीकरण अलंकार है।
  • इन पंक्तियों में श्रव्य बिंब (नगाड़ों की ध्वनि) तथा दृश्य बिंब (बादल और बिजली का दृश्य) का सुंदर चित्रण हुआ है।

नीले नयनों-सा यह अंबर,
काली पुतली-से ये जलधर।
करुणा-विगलित अश्रु बहाकर,
धरती की चिर-प्यास बुझाई।
बूढ़ी धरती शस्य-श्यामला
बनने को फिर से ललचाई।
पहली बूँद धरा पर आई।

कवि ने नीले आकाश की तुलना नीली आँखों से की है। काले बादलों की तुलना उन आँखों की काली पुतलियों से की है। बादल दया और करुणा से भरकर आँसू बहाते हैं। वही आँसू वर्षा बनकर धरती की लंबे समय से चली आ रही प्यास बुझाते हैं। लंबे सूखे के कारण थकी हुई धरती फिर से हरी-भरी फसलों से भर जाना चाहती है। वर्षा उसे नई उम्मीद देती है।

कला-पक्ष

  • “नीले नयनों-सा” और “काली पुतली-से” में उपमा अलंकार है।
  • “करुणा-विगलित अश्रु बहाकर” तथा “बूढ़ी धरती ललचाई” में मानवीकरण अलंकार है।
  • वर्षा को आँसू के रूप में प्रस्तुत करने से रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है।
कठिन शब्दअर्थ
पावसवर्षा ऋतु
धराधरती
अंकुरपौधे का नया कोमल भाग
नव-जीवननया जीवन
अँगड़ाईशरीर को फैलाकर जागने की क्रिया
अधरहोंठ
अमृतदेवताओं का दिव्य पेय, जीवनदायी रस
वसुंधरापृथ्वी, धरती
रोमावलिशरीर के रोमों (बालों) की पंक्ति
दूबएक प्रकार की हरी घास
पुलकीपुलकित, प्रसन्न
मुस्काईमुस्कुराई
स्वर्णिमसुनहरा
नगाड़ेबड़े वाद्ययंत्र जो बजाए जाते हैं
तरुणाईयुवावस्था, जवानी
अंबरआकाश
नयनआँख
जलधरबादल (जल धारण करने वाला)
पुतलीआँख का काला भाग
करुणादया, सहानुभूति
विगलितपिघला हुआ, भावुक
अश्रुआँसू
चिर-प्यासबहुत समय से लगी प्यास
बुझाईशांत की, समाप्त की
शस्य-श्यामलाहरी-भरी फसलों से युक्त
ललचाईइच्छा की, आकांक्षा की

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