Class 8 की मल्हार textbook का second chapter जिसमें लेखक ने एक परिवार और दो गौरैयों के माध्यम से मनुष्य और पक्षियों के सह-अस्तित्व, संवेदनशीलता तथा जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम को दिखाया है। इस कहानी के माध्यम से लेखक ने बहुत सहज ढंग से बताया है कि दूसरे जीवों को भी अपने घर और जीवन में रहने का अधिकार है।
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लेखक परिचय
भीष्म साहनी अपनी रचनाओं में मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक परिस्थितियों और देश-विभाजन की पीड़ा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। उनकी कहानियों और उपन्यासों में आम जीवन से जुड़े पात्र और घटनाएँ दिखाई देती हैं। उनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘तमस’ है, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से अलंकृत किया।
बच्चों के लिए भी भीष्म साहनी ने कई रोचक कहानियाँ लिखीं। ‘गुलेल का खेल’ उनकी ऐसी ही रचनाओं में से एक है।
दो गौरैया Chapter का सारांश
घर में रहने वाले अनेक जीव-जंतु
कहानी का आरंभ लेखक के घर के वर्णन से होता है। लेखक के पिता अपने घर को मज़ाक में सराय कहते थे, क्योंकि वहाँ तरह-तरह के जीव-जंतु रहते थे। घर में चूहे, बिल्ली, चमगादड़, कबूतर, छिपकलियाँ, ततैया, चींटियाँ और अन्य छोटे-बड़े जीव दिखाई देते थे।
इस कारण घर हमेशा किसी न किसी जीव की गतिविधियों से भरा रहता था। पिता को यह सब पसंद नहीं था और वे घर को साफ-सुथरा तथा व्यवस्थित रखना चाहते थे।
दो गौरैयाओं का घर में आना
एक दिन दो गौरैयाँ घर में आ जाती हैं। वे पूरे घर का ध्यान से निरीक्षण करती हैं। कुछ समय तक वे इधर-उधर घूमती रहती हैं और अपने लिए सुरक्षित स्थान तलाशती हैं।
आखिरकार उन्हें बैठक में लगे छत के पंखे के गोलाकार हिस्से में अपना घोंसला बनाने के लिए उपयुक्त जगह मिल जाती है। दोनों गौरैयाँ वहाँ तिनके आदि लाकर अपना घोंसला बनाना शुरू कर देती हैं।
गौरैयाओं के लिए वह स्थान सुरक्षित और सुविधाजनक था, लेकिन पिता को उनका वहाँ रहना बिल्कुल पसंद नहीं आया।
पिता का गौरैयाओं को भगाने का प्रयास
पिता गौरैयाओं को घर से बाहर निकालना चाहते थे। वे उन्हें डराने के लिए ताली बजाते, ‘श…श’ करते, हाथ हिलाते और तरह-तरह के प्रयास करते। गौरैयाँ कुछ समय के लिए उड़ जातीं, लेकिन फिर वापस आ जातीं।
पिता की परेशानी देखकर माँ उन्हें व्यंग्य में कहती हैं कि वे पहले चूहों को तो घर से निकाल नहीं पाए और अब चिड़ियों को निकालने चले हैं। माँ की इस बात में हास्य के साथ-साथ पिता की कोशिशों पर व्यंग्य भी छिपा है।
पिता फिर भी हार नहीं मानते। वे गौरैयाओं को भगाने के लिए और अधिक कोशिश करते हैं।
गौरैयाओं की जिद
पिता गौरैयाओं को जितना भगाते, गौरैयाँ उतनी ही बार वापस लौट आतीं। दिन में उन्हें घर से बाहर निकाल दिया जाता, लेकिन रात होते ही वे किसी न किसी रास्ते से फिर घर में आ जातीं। इससे पिता बहुत परेशान हो जाते थे।
गौरैयाओं के लिए वह घर अब केवल रहने की जगह नहीं था, बल्कि उनका अपना संसार बन चुका था। वे वहीं घोंसला बनाकर अपने बच्चों के लिए सुरक्षित जगह तैयार करना चाहती थीं।
पिता का घोंसला तोड़ना
आखिरकार पिता का धैर्य जवाब दे जाता है। वे लाठी लेकर गौरैयाओं का घोंसला तोड़ने लगते हैं। उनका उद्देश्य साफ था – किसी भी तरह गौरैयाओं को वहाँ से हमेशा के लिए हटा देना।
लेकिन तभी अचानक उन्हें ‘चीं-चीं’ की आवाज सुनाई देती है। वे ध्यान से देखते हैं तो घोंसले के अंदर से छोटे-छोटे गौरैया के बच्चे दिखाई देते हैं। दूसरी ओर बड़ी गौरैयाँ घबराकर बाहर बैठी हुई थीं।
पिता का हृदय परिवर्तन
छोटे-छोटे बच्चों को देखकर पिता के हाथ रुक जाते हैं। जो व्यक्ति कुछ क्षण पहले घोंसला तोड़ने पर तुला हुआ था, वह अचानक शांत हो जाता है। वह समझ जाता है कि यह केवल तिनकों का घोंसला नहीं है, बल्कि इन पक्षियों का घर और उनके बच्चों का सुरक्षित आश्रय है।
पिता बच्चों और उनके माता-पिता की स्थिति को देखकर संवेदनशील हो उठते हैं। उनके मन में गौरैयाओं के प्रति करुणा पैदा होती है। वे घोंसला तोड़ना छोड़ देते हैं।
अब उनके व्यवहार में पहले जैसी कठोरता नहीं रहती। बाद में जब गौरैयाँ अपने बच्चों के पास लौटती हैं और उन्हें दाना खिलाती हैं, तो पिता उन्हें देखकर मुस्कराते हैं। कहानी का अंत पिता के इसी बदले हुए भाव के साथ होता है।
Chapter का कठिन शब्दार्थ
| कठिन शब्द | शब्दार्थ |
|---|---|
| सराय | यात्रियों के ठहरने का स्थान |
| बिन बुलाए अतिथि | बिना बुलाए आया मेहमान |
| निरीक्षण | ध्यान से देखना या जाँच करना |
| योग्य | उपयुक्त |
| रोशनदान | घर की दीवार या छत में बनी रोशनी और हवा आने की जगह |
| बिछावन | सोने के लिए बिछाई जाने वाली वस्तु |
| व्यंग्य | किसी की कमी पर अप्रत्यक्ष रूप से मज़ाक करना |
| झिड़कना | डाँटना |
| हुक्म | आदेश |
| मौजूद | उपस्थित |
| परेशान | चिंतित या व्याकुल |
| सहसा | अचानक |
| ठिठकना | अचानक रुक जाना |
| अवाक् | आश्चर्य के कारण कुछ न बोल पाना |
| झाँकना | छिपकर या थोड़ी जगह से देखना |
| फाहा | रूई का छोटा टुकड़ा |
| थिगली | कपड़े का छोटा टुकड़ा |
| छावनी | सैनिकों के रहने का स्थान |
| खिलखिलाकर | बहुत प्रसन्न होकर हँसना |
| लपकना | तेजी से आगे बढ़ना |
| धमा-चौकड़ी | बहुत अधिक उछल-कूद और शोर |
| मार्मिक | मन को गहराई से छूने वाला |
दो गौरैया Chapter में आए मुहावरे और प्रयोग
| मुहावरा / प्रयोग | अर्थ | वाक्य में प्रयोग |
|---|---|---|
| उबल पड़ना | बहुत गुस्सा हो जाना | माँ की बात सुनकर पिताजी उबल पड़े। |
| मज़ाक उड़ाना | किसी का उपहास करना | पिताजी को लगा कि माँ उनका मज़ाक उड़ा रही हैं। |
| हमला बोलना | आक्रमण करना | पिताजी ने गौरैयों पर हमला बोल दिया। |
| छाती फैलाना | गर्व से अकड़कर बैठना | गौरैयों को बाहर निकालकर पिताजी छाती फैलाए कुर्सी पर बैठ गए। |
| हाथ ठिठक जाना | अचानक रुक जाना | नन्ही गौरैयों को देखकर पिताजी के हाथ ठिठक गए। |
| लाठी झुलाना | लाठी को तेजी से घुमाना | गौरैयों को भगाने के लिए पिताजी बार-बार लाठी झुलाते थे। |
| मौज से बैठना | आराम और खुशी से रहना | दोनों गौरैयाँ घोंसले में मौज से बैठी थीं। |
| धमा-चौकड़ी मचाना | बहुत शोर और उछल-कूद करना | बच्चे घर में धमा-चौकड़ी मचा रहे थे। |
| आँखों के सामने | प्रत्यक्ष रूप से | नन्हे पक्षियों का दृश्य पिताजी की आँखों के सामने था। |
| अवाक् रह जाना | आश्चर्य से कुछ न बोल पाना | नन्ही गौरैयों को देखकर लेखक अवाक् रह गया। |